रविवार, 9 अक्तूबर 2011

समीक्षा

तुम जल्‍दी क्‍यूं नही आये

आज तो तुम्‍हे फूल लाने थे

चलों में तो यू ही चला लूंगी

तुम्‍हारा बदन तप रहा है ना

में दबा देती हूं हाथ पैर।

थके हारे सवालों के साथ

संवेदनाओं की सिसकियां

और प्रेम की पराकाष्‍ठा।

मस्तिष्‍क के स्‍पदंनों में

शांति में स्‍नेह विचरता है

पर तुम्‍हारा सवालों में

यूं प्रेम का प्रगटिकरण

क्‍यां संगीत सहेजता है।

दिन भर की आपा धापी
में जिदद् की जददोजहद

तपते शरीर को तुम्‍हारा

सलहाना शर्म के साथ

किस चरम पर ले जाएगा

सुकून के साथ एक दर्द

भी तो दे जायेगा ना

मेरे अतंरंग में टंगा

चांद टुकडे होकर बिखरेगा

जो तुम्‍हारी आशक्ति के खूंटे

पर लटका था अब तक

और फिर पूरी रात

सलवटों की उलझ जाएगी

तुम्‍हारी सुकून की नींद के साथ

मेरे बदन का उबाल और

मन का कफयू का सन्‍नाटा

तुम्‍हारे अनजाने में अभिव्‍यक्‍त

इस प्रेम की समीक्षा करेगा

सुबह आने तक

2 टिप्‍पणियां:

  1. Katoon Si Chubhti Hai Tanhai,
    Angaroon Si Sulagti Hai Tanhai,
    Raat K Kisi Hisse Main Yeh Bhi Bewafa Ho Jati Hai,
    Main Nahi Sota Sone Lagti Hai Tanhai...

    उत्तर देंहटाएं
  2. Katoon Si Chubhti Hai Tanhai,
    Angaroon Si Sulagti Hai Tanhai,
    Raat K Kisi Hisse Main Yeh Bhi Bewafa Ho Jati Hai,
    Main Nahi Sota Sone Lagti Hai Tanhai...

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