शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पिता

तूम क्यूंक गुस्सामते थे, फिर चुप हो जाते थे
तुम्हायरे जाने के बाद अहसास हुआ है
अब मैं गुस्सााता हूं शायद तुम्हाैरे लहू का असर है
चुप क्यूंस रहते थे आभास हुआ
आज तुम्हासरी बहुत याद आई है
जो तब तब आती है जब जब मुझे मनमाफिक नहीं मिलता
नकार दिया जाता है मेरा अस्तित्वी,
छोटे भाई बहनों को चाह कर कुछ नहीं कह पाता
तब तुम्हाबरे पिता होने का राज जानने की कोशिश करता हूं
क्यूंम तुम्हेि नींद की गोलियों लेकर सोना पडता था
क्योंम तडके उठ कर या आधी रात को भी, कभी कभी
बैकार टहलाना होता था, मैने अब जाना
तुम अपने अन्तहर की सलवटों को
चेहरे की सलवटों में छिपा जाते थे
और मेरी उन तमाम हरकतो को भी
जो बेटे की तरह की भी नहीं होती थी
ईश्वेर की नियती मान भोग जाते थे
क्योंट कि तुम जानते थे की मेरी नफसों में
बह रहा खून तुम्हािरा है
मैं तुम्हा रे आगाज को अन्दा ज दे रहा हूं
तुम कैसे मुस्कु राते रहते थे
तुम्हासरे बैंक बैलेंस को जब देखा तो आश्चरर्य हुआ
तूम क्योंम मेरी ख्वाकईशों के आगे हार जाते थे ा
तुम मर गये दुनिया के लिये
तुम्हा री देह अब सिर्फ तस्वीदरों में है
पर मैं तुम्हेा जिन्दा रखूंगा
और तुम्हामरी तरह पिता बनूगां
और मेरा लहू जिन नफसों में बहेगा
उसे भी ताकीद करूंगा तुम्हामरी तरह बडे होने का

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति हैं -- अरुण! थोडा और काम करो सफल होगे ... प्रोफाइल अच्छा बना हैं ..बेटियों को प्यार

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  2. पिता शब्द में पूरी कायनात का समावेश होता है ,हर व्यक्ति की भावनओं को दर्शाती है आपकी यह उत्कृष्ट रचना.....

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